बिलासपुर-  kota जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था विगत 20 वर्षों से ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य और पोषण के मुद्दे पर काम कर रही है। संस्था द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में परंपरागत बीज माड़िया, कोदो, कुटकी, कांग, मक्का ज्वार,देशी धान आदि के बीजों के संरक्षण व संवर्धन कार्यक्रम के तहत बैगा आदिम जनजाति के आदिवासियों को एक दिवसीय प्रशिक्षण किया गया । वर्तमान में परंपरागत बीज विलुप्त होने की कगार पर है उन्हें कैसे सहजा और बचाया जाए एवं ग्रामीण खाद्य सुरक्षा और पोषण विविधता को कैसे जीवित रखा जाए इन उद्देश्यों को लेकर यह प्रशिक्षण किया गया , अवगत है कि अब आनाज के रूप में नई फसल लगभग पक कर तैयार है, परंतु आधुनिक जानकारी के आभाव में बीजों का संरक्षण व संवर्धन उचित रूप से नहीं होने के कारण बीज खराब हो जाता है, और फिर उसी बीज को खेत में उगाने के लिए बौहनी की जाती है परतुं बीज खराब होने के कारण अंकुरित नहीं होने से बीज खेतों में उग नहीं पता और किसान को नुकसान उठाना पड़ता है । इन्हीं परेशानी और जानकारी के अभावों को देखते हुए “संगम महिला बहुउद्देशीय सहकारी समिति” और “जन स्वाथ्य सहयोग गनियारी ” के सौजन्य से यह प्रशिक्षण आयोजित किया गया जिससे सीमांत किसानों को उन्नत तकनीक और जैविक खेती कैसे की जाए एवं देशी परंपरागत बीजों का संरक्षण व संवर्धन कैसे किया जाए इन विषयों पर जानकारी दी गई।


सामाजिक कार्यकर्ता अनिल बामने कहते हैं कि मौजूदा हालात पोषण की दृष्टि से ग्रामीण क्षत्रों में ठीक नहीं है यह NFHS- 4 का डेटा दर्शाता है। इसी श्रृंखला में देखें तो पोषण विविधता ग्रामीण क्षेत्रों से विलुप्त होते जा रही है, फर्टिलाइज़र खेती ने बहुत नुकसान किया है जिसका असर मानव स्वास्थ्य सीधा देखा जा सकता है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि जहर मुक्त परंपरागत जैविक खेती की जाए ऐसे प्रयासों से ही ग्रामीण खाद्य सुरक्षा व विलुप्त होने वालों बीजों को बचाया जा सकता है।
इस अवसर पर जन स्वास्थ्य सहयोग से होमप्रकाश साहू, बैगा प्रतिनिधि रामसिंह बैगा, शिवरात बैगा, श्रीमती बेन रत्नाकर, क्रांति मरावी, प्रकाशमणि मानिकपुरी, जगदेव कैवर्त उपस्थित रहे।

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