बिलासपुर छत्तीसगढ़ में प्राचीन काल से राजा महाराजाओं के समय से चली आ रही छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकपर्व भोजली तिहार सोमवार को बड़े हर्ष उल्लास के साथ मनाया गया। न्यायधानी में भी देर रात तक भोजली विसर्जन का सिलसिला चलता रहा जहां बड़ी संख्या में महिलाएं बच्चे युवतियां विसर्जन घाट पर पहुंची हुई थी।दरअसल छत्तीसगढ़ संस्कृति प्रकृति और आध्यात्मिक संस्कृति के लिए जाना पहचाना जाता है।इसलिए यहां की संस्कृति में प्रकृति प्रेम,अध्यात्म जैसे संबंधित अनेक पर्व के दर्शन होते रहते हैं।इसीतरह एक प्रकृति से जुड़ी पर्व रक्षा बंधन के दूसरे दिन भोजली है जिसे छत्तीसगढ़ में भोजली पर्व के रूप में मनाया जाता है।बिलासपुर जिले में भी नदी सरोवरों के तट पर भोजली विसर्जन के लिये लोग हर साल पहुंचते हैं।इसी तरह इस वर्ष भी सिरगिट्टी के मरिमाई मंदिर परिसर तालाब पर भोजली विसर्जित करने बड़ी संख्या में महिलाएं,बच्चे,युवतियां पहुंची हुई थी। नयापारा वार्ड नं 11 के भोजली टीम के अंजू यादव बताती हैं की इस तरह आयोजन तो घरों पर होती ही है लेकिन इस बार हम लोगों ने भव्य आयोजन कराने का निर्णय लिया था। जो पहली बार इस वर्ष लोगों में ऐसा उत्साहित वाला माहौल रहा जिसमें सभी लोग बढ चढ़कर हिस्सा लिया।जिसे सभी ने बढ़िया उत्साहित होकर मनाये हैं इसी तरह हम, हमेशा ऐसी ही अपनी परंपराओं को संरक्षित करतें रहेंगे।और मनायेगे।और हम मुहल्ले वासीयों के इस आयोजन पर सर्व यादव समाज की प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती सुनीता यादव भी पहुंची और हम सभी का मनोबल बढ़ाने हुए  मार्गदर्शन देकर शुभकामनाएं भी दी।बता दे कि भोजली विसर्जन के बाद बचें हुए भोजली के छोटे पौधे बड़े-बुजुर्गो को भेंट कर आशीर्वाद लिए। इन्हें एक-दूसरे को देकर मितान मित्र बनाने की परंपरा का भी निर्वहन किया। एक-दूसरे के कान में भोजली के पौधे लगाकर दोस्ती को अटूट बनाने की कसमें भी ली गई।लोगों का कहना है की प्राचीन काल राजा महाराजाओं के समय से भोजली का अपना एक अलग-अलग मान्यता है।देवी देवताओं व लोगों में खुशहाली की कामना के साथ अच्छी फसल प्राप्ति के उद्देश्य से पूजा अर्चना कर,किया जाता है।साथ ही भोजली का महत्व फ्रेंडशिप डे की तरह भी है,इसलिए सभी दोस्त अपने-अपने मितान से मिलने विसर्जन स्थल पर पहुंचते है।।शुक्ल पक्ष में मनाया जाने वाला भोजली पर्व बहू-बेटियों का भी पर्व है। सुहागिन महिलाएं व कुंआरी कन्याएं बांस की टोकरी में मिट्टी भरकर धान,जौ,उड़द बोती हैं।पहले इसे नागपंचमी के दिन अखाड़ा की मिट्टी लाकर बोया जाता था। लेकिन,समय के साथ अखाड़ा की परंपरा नहीं रही।आजकल इसे पंचमी से लेकर नवमी तिथि तक सुविधा अनुसार बोते हैं।फिर इसे घर के अंदर छांव में रखा जाता है। इसे श्रावण पूर्णिमा को मनाए जाने वाले पर्व राखी के दिन या इसके दूसरे दिन राखी चढ़ाने के बाद भादों में विसर्जित किया जाता है।और महिलाएं भोजली गीत गाकर सेवा करती हैं।और विसर्जन गीत देवी गंगा देवी गंगा लहर तुरंगा जैसे गीत भी गाते हैं।

“द बिलासा टाईम्स”

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